Saturday, December 9, 2017

Friday, December 8, 2017

यूपी-बिहार की पैसेंजर ट्रेनों में एक साथ कई मोर्चे पर युद्ध करना होता है। पटना में गया वाली ट्रेन जैसे ही रुकी, मुझे आपातकालीन खिड़की के पास सीट खाली दिखाई दी। मैंने कंधे से बैग उतार कर ऊपर की रेक में घुसाया और बैठने के लिए झुका तो पाया कि एक पल पहले जो सीट खाली थी उस पर एक महाशय बैठे हुए हैं। सहसा यकीन नहीं हुआ। मुझे लगा कि ग़लती से मैंने भाई साहब को न देखा हो। और फ़कत आँखों को यकीन दिलाने के लिए मैंने उनसे पूछा - भाई साहब! आप एकदम अचानक से सीट पर कैसे प्रकट हो गए?
भाई साहब ने विश्व विजेता मुस्कान के साथ आपातकालीन खिड़की की ओर इशारा करते हुए कहा - 'हम अक्सर ट्रेन में इसी खिड़की की तरफ़ से ही घुसते हैं'।
मैंने आपातकालीन खिड़की का इससे बेहतर इस्तेमाल पहले नहीं देखा था। मन ही मन भाई साहब के टैलेंट को नमन किया और सामने की सीट पर बैठ गया। थोड़ी देर बाद यात्रियों की भीड़ और सीटों की उपलब्धता में सामंजस्य स्थापित होने के बाद ट्रेन ने सरकना शुरू किया। मेरे साथ यात्रा कर रहे आचार्य मित्र आसपास के माहौल से विरक्त कंपटीशन बुक में खोए हुए थे। मुझे भी न चाहते हुए किताब खोलनी पड़ी। जैसे ही किताब में रेखांकित किए गए एक पद की पंक्ति पर नज़र गई - 'कबहूँ वा विसासी सुजान के आँगन मों अँसुवानि लै बरसौ'...
'घनानंद' के विरहाकुल आँसुओं में मैं पूरी तरह डूबता उसके पहले ही पीछे की सीट से किसी देशद्रोही कंपनी के मोबाइल ने जैसे शंखनाद किया - पियवा से पहिले हमार रहलू ऽऽ...
घनानंद के उस रीतिकालीन विरह के आँसुओं पर जब यह आधुनिक विरह का ज्वार-भाटा भारी पड़ने लगा तो मैंने किताब बंद कर देना ही ठीक समझा। आखिरकार लगभग तीन घंटे बाद सहयात्रियों के कन्धों के अनचाहे दबाव और कानों पर गिरतीं सांस्कृतिक लाठियों से लड़ते-झगड़ते उतरने का समय आया। गया स्टेशन से बाहर आकर हम हजारीबाग जाने के लिए बस स्टेशन पर पहुँचे। गया का बस स्टेशन मेरे द्वारा देखे गए अब तक के ऐतिहासिक इमारतों में अद्वितीय है। लगभग मर चुके पीले रंग की पियरी में कराहते इस भवन को देख कर लगता है कि अंग्रेज़ों ने इसे जैसे ही रंगवाना शुरू किया होगा वैसे ही उन्हें भारत छोड़ना पड़ा। अपनी दीवारों पर जगह-जगह उग आए पीपल के पौधों को धारण किए यह भवन अपने सरकारी होने के भार को ज़्यादा दिन सहन नहीं कर पाएगा।
खैर! हमने एक कंडक्टर जैसी वेशभूषा वाले सज्जन से पूछा कि - सर हजारीबाग के लिए बस कब है?
उन्होंने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा - वो सामने दुनिया भर की बसें तो खड़ी हैं...
मैंने कहा - नहीं सर! सरकारी बस कब है?
उन्होंने बताया कि सरकारी बस एक ही है सुबह चली गई। जाना है तो प्राइवेट बस से ही जाइए।
मैंने सरकारी और निजी क्षेत्र के इस अद्भुत सामंजस्य को भी नमन किया। और अब हम उस बस के आसपास चक्कर काटने लगे,जिसे दुल्हन की तरह सजाया गया था और उसके माथे पर मोटे-मोटे अक्षरों से लिखा था 'गया - हजारीबाग सुपरफास्ट एक्सप्रेस मेल'।
तभी बगल में खड़े आचार्य जी ने खुफिया खबर सुनाई कि इस बस का टिकट उस पेड़ की आड़ में मिल रहा है। रुकिए मैं लेकर आता हूँ।
मेरे लिए यह नई बात थी। हमारे यहाँ आप बस की खाली सीट पर बैठ जाइए समयानुसार कंडक्टर आपके पास आकर खुद टिकट दे जाएगा। लेकिन गया में आधी सीटें फोन पर बुक होतीं हैं और बची-खुची बहुत गंभीर सिफारिशों पर। थोड़ी देर बाद आचार्य जी ने आकर बताया कि सारी सीटें बुक हो गई है खड़े होकर जाने की भी सुविधा नहीं है।
हालाँकि हम थोड़े परेशान तो हुए कि अगर समय से बस नहीं मिली हजारीबाग पहुँचने में रात हो जाएगी और कोई होटल भी नहीं मिलेगा। लेकिन फिर भी मैंने आचार्य जी से कहा कि - अच्छा आप परेशान न होइए कोई उपाय बनेगा अभी।
और मैं ढूँढते-ढूँढते उस बस के ड्राइवर साहब के पास पहुँचा और कहा कि - ड्राइवर साहब! सीट दिलवाइए हम भी स्टाफ़ ही हैं... ।
ड्राइवर साहब ने एक नज़र ऊपर से नीचे तक मुझे देखा। इधर लगातार यात्रा के युद्धों से हम ड्राइवर-कंडक्टर से भी ज्यादा हसीन दिख रहे थे।
अचानक ड्राइवर साहब ने कहा - देखिए! 'साजन' तो भर गई है 'पागल' दो घंटे बाद है उसी से आ जाइए।
मैंने थकी हुई बसों की भीड़ में देखा एक बस के पीछे मटमैले लेकिन स्टाइलिश अक्षरों में लिखा था 'साजन' और दूसरी बस जिस पर 'पागल' लिखा था वो अभी एकदम जाने के मूड में नहीं दिख रही थी।
लेकिन मेरे एक दो बार और कहने पर उन्होंने मुझे 'साजन' के केबिन में ही जगह दी।
         गया से हज़ारीबाग का रास्ता ऊँचा - नीचा है। बस के शीशे पर छाई ग़र्द के बीच पहाड़ों की झलक देखना अच्छा लगता था। लगभग हर पहाड़ी पर सबसे ऊपर मंदिर और मंदिर के लिए जाते हुए नागिन की तरह टेढ़े-मेढ़े रास्ते। जंगलों से लकड़ी काट कर ला रही औरतों की एकाध कतारें,उनकी कमर से चिपके दुधमुंहे बच्चे, और उनके सिर पर लकड़ी के बोझ का वज़न। मानों प्रकृति ने स्त्री को कुछ अधिक वज़न ढोने के लिए अभिशप्त कर दिया हो। धीरे-धीरे शाम का अंधेरा छाता जा रहा था और अंधेरे में हज़ारीबाग हमारे नज़दीक आता जा रहा था।
           जब हम हज़ारीबाग बस स्टेशन पर उतरे तो शाम के सात बज रहे थे। शहर अंधकार से लड़ने के लिए रोड लाइट्स लगा कर तैयार था और इधर हमने रात भर रुकने के लिए होटल ढूँढना शुरू किया। लगभग दस होटल्स के चक्कर काट लेने के बाद पता चला कि हमने तो बहुत देर कर दी। लोगों ने सुबह से ही कमरे बुक करा लिए हैं। कुछ होटल वालों ने हाॅल में गद्दे बिछा रखे थे और एक तकिए के साथ एक कंबल का किराया चार सौ रुपए। हमने कुछ जगहों पर इस अवसर का भी लाभ उठाना चाहा लेकिन हमारे पहुँचते-पहुँचते वहाँ भी रिक्त स्थान की पूर्ति हो चुकी थी।
हम लोगों से होटल्स का पता पूछते, लोग भी इतने सज्जन थे कि कई सारे होटल्स का एड्रेस बताते-समझाते। कुछ लोग तो थोड़ी दूर तक साथ भी आए और खुद ही हम लोगों के लिए निवेदन किया। लेकिन उनकी भी मज़बूरी थी। एक ही दिन हज़ारों अभ्यर्थियों के आ जाने से कोई भी शहर व्यवस्थित नहीं रह सकता।
लगभग ढाई घंटे इस कोने से उस कोने घूमने के बाद जब पैरों ने शरीर को लगभग जवाब देते हुए कहा कि - तुमको और चलना हो तो चल लो, अब चलना हमारे बस की बात नहीं है। तब तय हुआ कि पहले खाना खाया जाए। हम फिर बस स्टेशन आए और कुछ खाने-पीने के लिए नज़र दौड़ाई। हर दुकान के बोर्ड पर तली हुई मछलियों के मसालेदार चित्रों को देखते-देखते इतना तो पता चल ही गया कि आज की रात भोजन भी नहीं मिलने वाला।
लेकिन तभी एक लिंक रोड पर थोड़े से उजाले में एक बोर्ड दिखा - 'मिश्रा जी शुद्ध भोजनालय'। यह बोर्ड देखकर हमें उतनी ही खुशी हुई जितनी खुशी किसी डॉक्टर को मरीज़ देखकर होती है या किसी ट्रैफ़िक पुलिस को बिना हैलमेट लगाए व्यक्ति को देखकर होती है। हम जल्दी से उस शुद्ध भोजनालय के पास पहुँचे और शुद्ध भाव से ही पूछा - पंडी जी! भोजन में क्या-क्या है?
पंडित जी ने बताया कि - 'सब कुछ' है।
'सब कुछ' शब्द पर शायद आचार्य जी को संदेह हो गया उन्होंने पूछा कि नाॅनवेज भी है?
पंडी जी ने - धीरे से कहा कि - हाँ वो भी है... ।
एक आखिरी उम्मीद के दिए को भी बुझता देखकर मैंने आचार्य जी से कहा - चलिए सेव खरीद लेते हैं।
आचार्य जी ने गर्वोन्नत होकर कहा - नहीं! अभी घर से लाया हुआ भोजन रखा हुआ है बैग में।
अब तो रहा नहीं गया मुझसे और फट ही पड़ा - तो अब तक चुप क्यों थे देवता?
आचार्य जी ने कहा कि - वो हम 'इमर्जेंसी' के लिए रखे थे न!
मैंनें खीझ कर कहा - गुरुदेव! अब इसके बाद जो इमर्जेंसी होगी उसमें तुलसी दल और गंगा जल की जरूरत होती है भोजन की नहीं।
             पानी की दो बोतलें खरीद लेने के बाद भोजन ग्रहण करने के लिए जगह का चुनाव भी बड़ी समस्या थी। परीक्षार्थियों की भारी भीड़ के कारण कहीं पैर रखने की भी जगह नहीं थी। अचानक मैंने देखा कि बस स्टेशन के बाएँ कोने पर एक गैरेज़ रूपी बारामदे में दो अभ्यर्थी अखण्ड सहचर भाव से लिपट कर सोए हुए हैं और उनसे थोड़ी दूरी बना कर एक भिक्षुक महाराज दीन-दुनिया से बेख़बर प्लास्टिक की बोरियों पर चैन की नींद ले रहे हैं। मैंने आचार्य जी से कहा - बैग से चादर निकाल कर बिछाइए यहाँ।
इस तरह हमारे एक साइड में एकाकार हुए विद्यार्थी युगल थे और दूसरी तरफ़ भूत, भविष्य और वर्तमान की चिंता से मुक्त भिक्षुक महाराज।
पहला कौर मुँह में डालते हुए आचार्य जी ने फ़ीकी हँसी हँसते हुए कहा - आज हमारे यह दिन आ गए कि हमें भिखारी के साथ सोना पड़ रहा है!
मैंने कुछ कहा तो नहीं। लेकिन मन में जरूर सोचा कि - हम हिंदी वाले लोग कितने कुटिल और छली होते हैं। भिखारियों की दीन-हीन दशा और उनकी फटी बिवाइयों वाले पैर पर कविता-कहानी लिखकर ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी ले लेंगे लेकिन एक रात मजबूरी में अपने ही पात्रों के साथ सोना पड़ जाए तो... ।
मुझे नागार्जुन की एक और बात याद आई। उन्होंने एक बार अपने बड़े पुत्र शोभाकांत को समझाते हुए कहा था कि - "कभी भी अपनी तुलना ऊपरी वर्ग से मत करो। नीचे देखो तब समझ में आएगा कि जीवन क्या है! तुम्हें तो किसी तरह दोनों समय रूखा-सूखा खाना मिल जाता है, अपने आसपास देखो कितने लोग ऐसे हैं जिन्हें दो - दो दिन तक अन्न देखने तक को नहीं मिलता"।
               खैर आचार्य जी उधर चादर तान कर सोए और इधर हमने आखिरी कोशिश करते हुए हज़ारीबाग के ही फेसबुक मित्र भाई अमित सिंह जी से कहा कि - भैया अपने किसी दोस्त से पूछिए कि शहर से इधर-उधर कोई होटल मिल सकता है क्या?
अमित भाई जैसे चौंक पड़े - मेरे शहर में होकर आप होटल में रुकेंगे? मेरे घर जाइए। मैं मम्मी को बता रहा हूँ कि आप वहीं हैं...
मैंने कहना चाहा कि - भैया! अभी आप बैंगलोर में हैं न! घर फिर कभी आ जाऊंगा अभी के लिए होटल ही ठीक है।
लेकिन उधर से अमित भैया ने कहा कि - अरे माँ तो है न! आप चलिए मैं होल्ड पर ही हूँ।
मैंने आचार्य प्रवर को जगाया - गुरुदेव चलिए! अमित भैया के घर चलना है।
गुरुदेव अब तक उस परिस्थिति में लेटे-लेटे सांसारिक विषय-वासनाओं से ऊपर उठ चुके थे। उन्होंने चलने की तैयारी की। जूते पहने, चादर बैग में रख ही रहे थे कि थोड़ी दूर पर खड़े दो लड़कों ने कहा - धन्यवाद भैया।
मैंने कहा - आप लोग क्यों धन्यवाद दे रहे हैं भाई?
दोनों भाइयों ने खुशी से बताया - आप लोग जा रहे हैं न तो इस जगह पर अब हम सोएंगे।
मैं हतप्रभ रह गया। जिस जगह पर सोने में हमें अपनी बेइज्जती लग रही थी वो जगह हम ही जैसे लड़कों के लिए इतनी उपयोगी है कि उन्होंने धन्यवाद दिया!अद्भुत है प्रकृति भी हम थाली में जो रोटियाँ फेंक देते हैं उनसे भी हमारे जैसे ही पेट भरते होंगे यह सोचने की फ़ुरसत कहाँ है इस फोर - जी टाईम में?
               दस मिनट बाद ही हम अमित भैया के बेहद खूबसूरत घर के सामने खड़े थे वहाँ उनके मम्मी-पापा दोनों खड़े मिले। जैसे ही अंकल जी को पता चला कि हम टीचिंग की परीक्षा देने आए हैं वैसे ही उन्होंने अपने जीवन के शैक्षिक उतार चढ़ावों से हमें लैस करना शुरू कर दिया उधर इन सब बातों से एकदम अलग आंटी को बस एक बात की चिंता - क्या खाओगे? सुबह से कुछ खाया कि नहीं? चाय पियोगे? ठंड तो नहीं लगी न?
             हज़ारीबाग की सुबह बलिया की तरह एक ही बार नहीं होती। वहाँ सूरज पहले पहाड़ और बड़े - बड़े पेड़ों से लड़ता है। पहले गर्मी छाती है चिड़ियों की आवाज़ें थक जाती हैं तब सूरज सिर पर चढ़ आता है कि लो आ गए न!
गरम कंबल की गरमी और पिछली रात की थकान ने शायद परीक्षा और परीक्षार्थी के बीच एक मूक समझौता करा दिया था। लेकिन तभी आंटी ने आवाज़ दी - पानी गरम हो गया है बेटा नहा लो।
हम नहा धोकर तैयार हुए तब तक आंटी ने सत्तू की पूरियाँ सब्जी और दही नाश्ते की मेज पर रख दिया और कहा कि जल्दी से नाश्ता कर लो।
हालांकि सुबह सात बजे नाश्ते की आदत कभी नहीं रही इसलिए मैंने कहा भी - अरे आंटी इसकी एकदम जरूरत नहीं थी...
मेरी बात काटते हुए चश्मे के पीछे से आँखें दिखाते हुए कहा उन्होंने - जरूरत कैसे नहीं थी परीक्षा में बैठना है...
इधर हमने खाना शुरू किया तभी अंकल जी ने पूछा - अच्छा आप लोग तो ब्राह्मण हैं माँस - मछली खाते हैं कि नहीं?
मैंने हँस कर आचार्य जी की ओर संकेत करते हुए कहा - ये कभी-कभी अंडे खा लेते हैं।
इधर आचार्य जी ने आँखों की मिसाइलें मुझ पर तान लीं। उधर रसोईघर से निकल कर आंटी ने कहा - "बेटा! अब यह मत सोचना कि चार तरह की सब्जियाँ क्यों नहीं मिलीं, तुम लोगों को भी तो सोचना होगा न कि माँ अब बूढ़ी हो गई है"।
            पता नहीं इस एक वाक्य में क्या था कि मुझे खाने की थाली धुँधली दिखने लगी। आचार्य जी भी भावुक हो गए।
मुझे याद आया कि 'संस्कृति के चार अध्याय' में 'दिनकर' ने भारत की सांस्कृतिक विभिन्नता का वर्णन करते हुए कहा है कि-" कोस कोस पर बदले पानी,चार कोस पर बानी"। मतलब यहाँ हर एक कोस पर पानी का स्वाद बदल जाता है और हर चार कोस पर बोली बदल जाती है।
लेकिन पूरी दुनिया में अगर कोई चीज़ कभी नहीं बदलती तो माँ मातृत्व और ममता। माँ चाहे बलिया की हो या गोरखपुर की हज़ारीबाग की हो या अफ्रीका की उसके आवाज़ में भिन्नता हो सकती है लेकिन मातृत्व में नहीं।
            परीक्षा के दौरान मेरी कोशिश रहती है कि आगे - पीछे से कोई सवाल - जवाब न करूं। लेकिन आगे-पीछे से ही सवाल - जवाब होने लगते हैं तो बेरुखी से 'मुझे नहीं आता' कहना भी बहुत अज़ीब सा लगता है। इसलिए जैसे ही प्रश्न पत्र खोलने का आदेश हुआ मैंने सबसे आसान सवाल आगे वाली बहनजी से पूछ लिया - हैलो! गोदान तो जयशंकर प्रसाद की रचना है न?
बहन जी ने मुझे उसी नज़रों से देखा जिन नज़रों से 'गोदान' में मिस मालती ने मिस्टर खन्ना को देखा था। और अफ़सोस से कहा उन्होंने - अगर बता भी दिया तो क्या कर लोगे!
यही सवाल मैंने पीछे वाले भाई से भी किया। अब इस सवाल का चमत्कार यह हुआ कि तीन घंटे में मुझसे किसी ने कुछ भी नहीं पूछा।
पेपर बहुत अच्छा होने की खुशी ने पिछले दिन के तनाव को दूर करने में काफ़ी मदद की। अब हमारी ट्रेन रात के साढ़े दस बजे हज़ारीबाग रोड रेलवे स्टेशन से थी।मेरा अनुमान था कि रेलवे स्टेशन पास में ही होगा। लेकिन बस स्टेशन पर आकर पता चला कि हज़ारीबाग से हज़ारीबाग रोड रेलवे स्टेशन की दूरी इतनी ज्यादा है कि बस से तीन घंटे लगेंगे। अत्यधिक भीड़ के कारण बस में घुसना एक जटिल प्रक्रिया थी। दो तीन बसें भर कर निकल जाने के बाद एक बस में टिकट मिली। कंडक्टर ने ऊपर बैठने का आदेश दिया।
मैंने बस में झांककर कहा कि- इसमें तो ऊपर सीट ही नहीं है।
कंडक्टर ने मेरी बुद्धि पर तरस खाते हुए बस की छत दिखाते हुए कहा - उधर ऊपर...
हे भगवान! मैंने जिंदगी में बेहद छोटे - मोटे पाप किए हैं। बस और ट्रेन की छत पर बैठकर यात्रा करने जैसा दुष्कर्म कभी नहीं किया।
मैंने कंडक्टर को डाँट कर पूछा - और रास्ते में पुलिस ने पकड़ा तो?
मेरे सवाल का जवाब मिलने से पहले ही बीस लड़के बस की छत पर सवार हो गए। मैंने आचार्य जी से कहा - गुरुदेव! जीवन का एक यह भी अनुभव ले लिया जाए। थोड़ी देर बाद जब ऊपर बैठने क्या हिलने की भी जगह नहीं रही तो बस ने चलना शुरू किया। रास्ते में पेड़-पौधे, पुलिस चौकियाँ आतीं गईं लेकिन किसी ने कोई आपत्ति नहीं की। हाँ! एक बात यह समझ में आई कि जिस बस के ऊपर पच्चीस - पचास लोग बैठे न हों उस बस को अच्छी नज़रों से नहीं देखा जाता यहाँ ।
                रेलवे स्टेशन पर आकर जैसे जान में जान आई। लगा कि अब हमारी समस्याओं का अंत हो गया। अब तो बस ट्रेन में बैठना है और सुबह पाँच बजे बनारस उतर जाना है। लेकिन हमें क्या पता था कि  हज़ारीबाग को हमसे मुहब्बत हो चुकी थी। स्टेशन के प्रतीक्षालय में जब हमने इंतज़ार की लगभग आधी सज़ा काट ली तो अचानक अनाउंस हुआ कि "धनबाद के रास्ते हजारीबाग गया सासाराम डेहरी आन सोन होते हुए वाराणसी को जाने वाली गंगा - सतलुज एक्सप्रेस आठ घंटे की देरी से आएगी, आपकी असुविधा के लिए हमें खेद है"।
दस बजे की ट्रेन सुबह सात बजे आएगी। यह सोच कर ही जैसे धड़कनें ठहर गईं। इसका मतलब यह कि आज की रात हज़ारीबाग रेलवे स्टेशन पर काटनी होगी। मुझे लगता है कि भारतीय रेल विभाग जितनी सुविधा और विनम्रता से हमारी असुविधा के लिए खेद जताता है उतनी विनम्रता किसी भी दूसरे सरकारी विभाग में नहीं होती होगी।
हाँ! अच्छा यह हुआ कि इस बार बिना कुछ कहे आचार्य जी ने बैग से चादर निकाला, बिछाया और सो गए।
मैं क्या कहता और सुनता। ठंड की रात छोटा सा प्लेटफॉर्म जहाँ शौचालय भी ट्रेन के आने-जाने पर खुलता हो वहाँ रात भर काटना।
बेमन से फेसबुक खोला अचानक नरेन भैया का मैसेज़ दिखा। जिसमें लिखा था - असित भाई हज़ारीबाग में कोई भी बात हो तो बताइएगा।
अब बताने के लिए था ही क्या! मैंने उत्तर में लिखा कि नहीं सब ठीक है। रात वाली ट्रेन कल सुबह आएगी। दुआ कीजिएगा कि तब तक जिवित रह जाऊँ।
मैंने फेसबुक भी बंद किया और आचार्य जी के बगल में लेट गया। नीचे का ठंडा फर्श हमारी ऊष्मा से गरम हो रहा था और उसकी शीतलता से हम शीतल। तभी मोबाइल बजा। उधर से आवाज आई - असित भाई! मैं सेक्शन इंजीनियर प्रभाष चंद्रा बोल रहा हूँ। अधिकारी आवास खोल दिया गया है आप उसमें चले जाएँ।
सहसा यकीन नहीं हुआ। कुछ मिनट पहले रेलवे को दी गई छोटी-मोटी गालियों को भारतीय नेताओं की तरह वापस लिया और बगल में लेटे आचार्य जी को जगाया।
मैंने नरेन भैया को फोन करके कहा कि - भैया इतना इंतज़ाम करने की क्या जरूरत थी आप लोग सीमा पर सारी रात खड़े रहते हैं मैं एक रात प्लेटफॉर्म पर नहीं गुजार सकता!
नरेन भैया ने जो कहा वो देश के हर नागरिक के लिए याद रखने की बात है। कहा उन्होंने कि - असित भाई! हम सेना के लोग हैं हमारे लिए हमारा सिविलियन फर्स्ट होता है...
         मैं नहीं जानता कि मुझे होटल्स तक ले जाने वाले हज़ारीबाग के वो लोग फिर कभी मिलेंगे कि नहीं! मुझे यह भी नहीं पता कि बैंगलोर में कहीं इंजीनियर अमित सिंह भाई से कभी मिलना होगा कि नहीं! जीवन में फिर कभी उस एक रात की माँ से मिल पाऊँगा कि नहीं! देश के किसी सीमा से उल्टे-सीधे पोस्ट लिखने वाले फौजी नरेन भैया और प्रभाष चंद्रा सर से मिलना होगा कि नहीं...
मुझे तो इतना भी नहीं पता कि ज़िंदगी की वो दो रातें फिर जीवन में कभी आएंगी या नहीं कि जब हम सड़क के किनारे से उठ कर एयरकंडीशन्स रूम में पहुँचे या प्लेटफॉर्म से उठ कर सीधे अधिकारी आवास तक पहुँच गए... उसके पहले चाहता हूँ कह दूँ - शुक्रिया जिंदगी... शुक्रिया दोस्तों!

असित कुमार मिश्र
बलिया

      

यूपी बिहार की पैसेंजर ट्रेन में आपको एक साथ कई मोर्चे पर युद्ध करना होता है। ट्रेन जैसे ही रुकी मुझे आपातकालीन खिड़की के पास सीट खाली दिखाई दी। मैंने कंधे से बैग उतार कर ऊपर की रेक में घुसाया और बैठने के लिए झुका तो देखा कि एक पल पहले जो सीट खाली थी उस पर एक महाशय बैठे हुए हैं। सहसा यकीन नहीं हुआ। मुझे लगा कि ग़लती से मैंने भाई साहब को न देखा हो। लेकिन आँखों को यकीन दिलाने के लिए मैंने उसने पूछा - भाई साहब! आप एकदम अचानक से सीट पर कैसे प्रकट हो गए?
भाई साहब ने विश्व विजेता मुस्कान के साथ आपातकालीन खिड़की की ओर इशारा करते हुए कहा - हम अक्सर ट्रेन में इस खिड़की की तरफ से ही घुसते हैं।
मैंने आपातकालीन खिड़की का इससे बेहतर इस्तेमाल पहले नहीं देखा था। मन ही मन भाई साहब के टैलेंट को नमन किया और सामने की सीट पर बैठ गया। थोड़ी देर बाद यात्रियों की भीड़ और सीटों की उपलब्धता में सामंजस्य स्थापित होने के बाद ट्रेन ने सरकना शुरू किया। मेरे साथ यात्रा कर रहे आचार्य मित्र आसपास के माहौल से विरक्त कंपटीशन बुक में खोए हुए थे। मुझे भी न चाहते हुए किताब खोलनी पड़ी। जैसे ही किताब में रेखांकित किए गए एक पद की पंक्ति पर नज़र गई - 'कबहूँ वा विसासी सुजान के आँगन मों अँसुवानि लै बरसौ'...
घनानंद के विरहाकुल आँसुओं में मैं पूरी तरह डूबता उसके पहले ही पीछे की सीट से किसी देशद्रोही कंपनी के मोबाइल ने जैसे शंखनाद किया - पियवा से पहिले हमार रहलू ऽऽ...
घनानंद के उस रीतिकालीन विरह के आँसुओं पर जब यह आधुनिक विरह का ज्वार-भाटा भारी पड़ने लगा तो मैंने किताब बंद कर देना ही ठीक समझा। आखिरकार लगभग तीन घंटे बाद सहयात्रियों के कन्धों के अनचाहे दबाव और कानों पर गिरतीं सांस्कृतिक लाठियों से लड़ते - झगड़ते उतरने का समय आया। गया स्टेशन से बाहर आकर हम हजारीबाग जाने के लिए बस स्टेशन पर पहुँचे। गया का बस स्टेशन मेरे द्वारा देखे गए अब तक के ऐतिहासिक इमारतों में अद्वितीय है। लगभग मर चुके पीले रंग की पियरी में कराहते इस भवन को देख कर लगता है कि अंग्रेज़ों ने इसे जैसे ही रंगवाना शुरू किया होगा वैसे ही उन्हें भारत छोड़ना पड़ा। अपनी दीवारों पर जगह जगह उग आए पीपल के पौधों को धारण किए यह भवन अपने सरकारी होने के भार को ज्यादा दिन सहन नहीं कर पाएगा। खैर! हमने एक कंडक्टर जैसी वेशभूषा वाले सज्जन से पूछा कि - सर हजारीबाग के लिए बस कब है? उन्होंने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा - वो सामने दुनिया भर की बसें तो खड़ी हैं...
मैंने कहा - नहीं सर सरकारी बस कब है?
उन्होंने कहा कि सरकारी बस एक ही है सुबह चली गई। जाना है तो प्राइवेट बस से ही जाइए।
मैंने सरकारी और निजी क्षेत्र के इस अद्भुत सामंजस्य को भी नमन किया। और अब हम उस बस के आसपास चक्कर काटने लगे जो जिसे दुल्हन की तरह सजाया गया था और उसके माथे पर मोटे मोटे अक्षरों से लिखा था 'गया - हजारीबाग सुपरफास्ट एक्सप्रेस मेल'।
तभी बगल में खड़े आचार्य जी ने खुफिया खबर सुनाई कि इस बस का टिकट उस पेड़ की आड़ में मिल रहा है। रुकिए मैं लेकर आता हूँ।
मेरे लिए यह नई बात थी। हमारे यहाँ आप बस की खाली सीट पर बैठ जाइए समयानुसार कंडक्टर आपके पास आकर खुद टिकट दे जाएगा। लेकिन गया में आधी सीटें फोन पर बुक होतीं हैं और बची खुची बहुत गंभीर सिफारिशों पर। थोड़ी देर बाद आचार्य जी ने आकर बताया कि सारी सीटें बुक हो गई है खड़े होकर जाने की भी सुविधा नहीं है।
हालांकि हम थोड़े परेशान तो हुए कि अगर समय से बस नहीं मिली हजारीबाग पहुँचने में रात हो जाएगी और कोई होटल भी नहीं मिलेगा। लेकिन फिर भी मैंने आचार्य जी से कहा कि - अच्छा आप परेशान न होइए कोई उपाय बनेगा अभी।
और मैं ढूंढते ढूंढते उस बस के ड्राइवर साहब के पास पहुंचा और कहा कि - ड्राइवर साहब! सीट दिलवाइए हम भी स्टाफ़ ही ही हैं... ।
ड्राइवर साहब ने एक नज़र ऊपर से नीचे तक मुझे देखा। इधर लगातार यात्रा के युद्धों से हम ड्राइवर कंडक्टर से भी ज्यादा हसीन दिख रहे थे।
अचानक ड्राइवर साहब ने कहा - देखिए! 'साजन' तो भर गई है 'पागल' दो घंटे बाद है उसी से आ जाइए।
मैंने थकी हुई बसों की भीड़ में देखा एक बस के पीछे मटमैले लेकिन स्टाइलिश अक्षरों में लिखा था साजन और दूसरी बस जिस पर पागल लिखा था वो अभी एकदम जाने के मूड में नहीं दिख रही थी।
लेकिन मेरे एक दो बार और कहने पर उन्होंने मुझे साजन के केबिन में ही जगह दी।
         गया से हजारीबाग का रास्ता ऊँचा - नीचा है। बस के शीशे पर छाई गर्द के बीच पहाड़ों की झलक देखना अच्छा लगता था। लगभग हर पहाड़ी पर सबसे ऊपर मंदिर और मंदिर के लिए जाते हुए नागिन की तरह टेढ़े-मेढ़े रास्ते। जंगलों से लकड़ी काट कर ला रही औरतों की एकाध कतारें और उनकी कमर से चिपके दुधमुंहे बच्चे। मानों प्रकृति ने स्त्री को कुछ अधिक वज़न ढोने के लिए अभिशप्त कर दिया हो। धीरे धीरे शाम का अंधेरा छाता जा रहा था और अंधेरे में हजारीबाग की भूमि करीब आती जा रही थी।
जब हम हजारीबाग बस स्टेशन पर उतरे तो शाम के सात बज रहे थे। शहर अंधकार से लड़ने के लिए रोड लाइट्स लगा कर तैयार था और इधर हमने रात भर रुकने के लिए होटल ढूंढना शुरू किया। लगभग बीस होटल्स के चक्कर काट लेने के बाद पता चला कि हमने तो बहुत देर कर दी। लोगों ने सुबह से ही कमरे बुक करा लिए हैं। कुछ होटल वालों ने हाॅल में गद्दे बिछा रखे थे और एक तकिए के साथ एक कंबल का किराया चार सौ रुपए। हमने कुछ जगहों पर इस अवसर का भी लाभ उठाना चाहा लेकिन हमसे पहले यहाँ भी कुछ लोग आगे निकले।
हम लोगों से होटल्स का पता पूछते, लोग भी इतने सज्जन थे कि कई सारे होटल्स का एड्रेस बताते-समझाते। कुछ लोग तो थोड़ी दूर तक साथ भी आए और खुद ही हम लोगों के लिए निवेदन किया। लेकिन उनकी भी मजबूरी थी। एक ही दिन हजारों अभ्यर्थियों के आ जाने से कोई भी शहर व्यवस्थित नहीं रह सकता।
लगभग ढाई घंटे इस कोने से उस कोने घूमने के बाद जब पैरों ने शरीर को लगभग जवाब देते हुए कहा कि - तुमको और चलना हो तो चल लो अब चलना हमारे बस की बात नहीं है तब तय हुआ कि पहले खाना खाया जाए। हम फिर बस स्टेशन आए और कुछ खाने पीने के लिए नज़र दौड़ाई। हर दुकान के बोर्ड पर तली हुई मछलियों के मसालेदार चित्रों को देखते देखते इतना तो पता चल ही गया कि आज की रात भोजन भी नहीं मिलने वाला।
लेकिन तभी एक लिंक रोड पर थोड़े से उजाले में एक बोर्ड दिखा - 'मिश्रा जी शुद्ध भोजनालय'। यह बोर्ड देखकर हमें उतनी ही खुशी हुई जितनी खुशी किसी डॉक्टर को मरीज देखकर होती है या किसी ट्रैफिक पुलिस को बिना हैलमेट लगाए व्यक्ति को देखकर होती है। हम जल्दी से उस शुद्ध भोजनालय के पास पहुँचे और शुद्ध भाव से ही पूछा - पंडी जी! भोजन में क्या - क्या है?
पंडित जी ने बताया कि - 'सब कुछ' है।
'सब कुछ' शब्द पर शायद आचार्य जी को संदेह हो गया उन्होंने पूछा कि नाॅनवेज भी है?
पंडी जी ने - धीरे से कहा कि - हाँ वो भी है... ।
एक आखिरी उम्मीद के दिए को भी बुझता देखकर मैंने आचार्य जी से कहा - चलिए सेव खरीद लेते हैं।
आचार्य जी ने गर्वोन्नत होकर कहा - नहीं! अभी घर से लाया हुआ भोजन रखा हुआ है बैग में।
अब तो रहा नहीं गया मुझसे और फट ही पडा़ - तो अब तक चुप क्यों थे देवता?
आचार्य जी ने कहा कि - वो हम इमर्जेंसी के लिए रखे थे न!
मैंनें खीझ कर कहा - गुरुदेव! अब इसके बाद जो इमर्जेंसी होगी उसमें तुलसी दल और गंगा जल की जरूरत होती है भोजन की नहीं।
           पानी की दो बोतलें खरीद लेने के बाद भोजन ग्रहण करने के लिए जगह का चुनाव भी बड़ी समस्या थी। परीक्षार्थियों की भारी भीड़ के कारण कहीं पैर रखने की भी जगह नहीं थी। अचानक मैंने देखा कि बस स्टेशन के बाएँ कोने पर एक गैरेज रूपी बारामदे में दो अभ्यर्थी निरपेक्ष भाव से द्वितियोनास्ति भाव से लिपट कर सोए हुए हैं और उनसे थोड़ी दूरी बना कर एक भिक्षुक महाराज दीन दुनिया से बेखबर प्लास्टिक की बोरियों पर चैन की नींद ले रहे हैं।
मैंने आचार्य जी से कहा - बैग से चादर निकाल कर बिछाइए यहाँ। इस तरह हमारे एक साइड में एकाकार हुए विद्यार्थी युगल थे और दूसरी तरफ़ भूत भविष्य और वर्तमान की चिंता से मुक्त भिक्षुक महाराज।
पहला कौर मुँह में डालते हुए आचार्य जी ने फीकी हँसी हँसते हुए कहा - आज हमारे यह दिन आ गए कि हमें भिखारी के साथ सोना पड़ रहा है!
मैंने कुछ कहा तो नहीं। लेकिन मन में जरूर सोचा कि - हम हिंदी वाले लोग स्वभावत: ऐसे ही कुटिल और छली होते हैं। भिखारियों की दीन हीन दशा उनकी फटी बिवाइयों वाले पैर पर कविता कहानी लिखकर ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी ले लेंगे लेकिन एक रात मजबूरी में अपने ही पात्रों के साथ सोना पड़ जाए तो... ।
मुझे नागार्जुन की एक और बात याद आई। उन्होंने एक बार अपने बड़े पुत्र शोभाकांत को समझाते हुए कहा था कि - "कभी भी अपनी तुलना ऊपरी वर्ग से मत करो। नीचे देखो तब समझ में आएगा कि जीवन क्या है! तुम्हें तो किसी तरह दोनों समय रूखा सूखा खाना मिल जाता है अपने आसपास देखो कितने लोग ऐसे हैं जिन्हें दो दो दिन तक अन्न देखने तक को नहीं मिलता"।
               खैर आचार्य जी उधर चादर तान कर सोए और इधर हमने आखिरी कोशिश करते हुए हजारीबाग के ही फेसबुक मित्र भाई अमित सिंह जी से कहा कि कि - भैया अपने किसी दोस्त से पूछिए कि शहर से इधर-उधर कोई होटल मिल सकता है क्या?
अमित भाई जैसे चौंक पड़े - मेरे शहर में होकर आप होटल में रुकेंगे? मेरे घर जाइए। मैं मम्मी को बता रहा हूँ कि आप वहीं हैं...
मैंने कहना चाहा कि - भैया! अभी आप बैंगलोर में हैं न! घर फिर कभी आ जाऊंगा अभी के लिए होटल ही ठीक है।
लेकिन उधर से अमित भैया ने कहा कि - अरे माँ तो है न! आप चलिए मैं होल्ड पर ही हूँ।
मैंने आचार्य प्रवर को जगाया - गुरुदेव चलिए! अमित भैया के घर चलना है।
गुरुदेव उस परिस्थिति में लेटे लेटे सांसारिक विषय - वासनाओं से ऊपर उठ चुके थे। उन्होंने चलने की तैयारी की। जूते पहने, चादर बैग में रख ही रहे थे कि थोड़ी दूर पर खड़े दो लड़कों ने कहा - धन्यवाद भैया।
मैंने कहा - आप लोग क्यों धन्यवाद दे रहे हैं भाई?
दोनों भाइयों ने खुशी से बताया - आप लोग जा रहे हैं न तो इस जगह पर अब हम सोएंगे।
मैं हतप्रभ रह गया। जिस जगह पर सोने में हमें अपनी बेइज्जती लग रही थी वो जगह हम ही जैसे लड़कों के लिए इतनी उपयोगी है कि उन्होंने धन्यवाद दिया!
          दस मिनट बाद ही हम अमित भैया के बेहद खूबसूरत घर के सामने खड़े थे वहाँ उनके मम्मी - पापा दोनों खड़े मिले। जैसे ही अंकल जी को पता चला कि हम टीचिंग की परीक्षा देने आए हैं वैसे ही उन्होंने अपने जीवन के शैक्षिक उतार चढ़ावों से हमें लैस करना शुरू कर दिया उधर इन सब बातों से एकदम अलग आंटी को बस एक बात की चिंता - क्या खाओगे? सुबह से कुछ खाया कि नहीं?
             हजारीबाग की सुबह बलिया की तरह एक ही बार नहीं होती। वहाँ सूरज पहले पहाड़ और बड़े बड़े पेड़ों से लड़ता है। पहले गर्मी छाती है चिड़ियों की आवाज़ें थक जाती हैं तब सूरज सिर पर चढ़ आता है कि लो आ गए न! गरम कंबल की गर्मी और पिछली रात की थकान ने शायद परीक्षा और परीक्षार्थी के बीच एक मूक समझौता करा दिया था। लेकिन तभी आंटी ने कहा कि पानी गरम हो गया बेटा नहा लो।
हम नहा धोकर तैयार हुए तब तक आंटी ने सत्तू की पूरियाँ सब्जी और दही नाश्ते की मेज पर रख दिया और कहा कि जल्दी से नाश्ता कर लो।
हालांकि सुबह सात बजे नाश्ते की आदत कभी नहीं रही इसलिए मैंने कहा भी - अरे आंटी इसकी एकदम जरूरत नहीं थी...
मेरी बात काटते हुए चश्मे के पीछे से आँखें दिखाते हुए कहा उन्होंने जरूरत कैसे नहीं थी परीक्षा में बैठना है...
इधर हमने खाना शुरू किया तभी अंकल जी ने पूछा - अच्छा आप लोग तो ब्राह्मण हैं माँस - मछली खाते हैं कि नहीं?
मैंने हँस कर आचार्य जी की ओर संकेत करते हुए कहा - ये कभी-कभी अंडे खा लेते हैं।
इधर आचार्य जी ने आँखों की मिसाइलें मुझ पर तान लीं। उधर रसोईघर से निकल कर आंटी ने कहा - "बेटा! अब यह मत सोचना कि चार तरह की सब्जियाँ क्यों नहीं मिलीं, तुम लोगों को भी तो सोचना होगा न कि माँ अब बूढ़ी हो गई है"।
            पता नहीं इस एक वाक्य में क्या था कि मुझे खाने की थाली धुँधली दिखने लगी। आचार्य जी भी भावुक हो गए। मुझे याद आया कि संस्कृति के चार अध्याय में दिनकर ने भारत की सांस्कृतिक विभिन्नता का वर्णन करते हुए कहा है कि कोस कोस पर बदले पानी चार कोस पर बानी। मतलब यहाँ हर एक कोस पर पानी का स्वाद बदल जाता है और हर चार कोस पर वाणी बदल जाती है।
लेकिन पूरी दुनिया में अगर कोई चीज़ कभी नहीं बदलती तो माँ मातृत्व और ममता। माँ चाहे बलिया की हो या गोरखपुर की हजारीबाग की हो या अफ्रीका की उसके आवाज़ में भिन्नता हो सकती है लेकिन मातृत्व में नहीं।
            परीक्षा के दौरान मेरी कोशिश रहती है कि आगे - पीछे से कोई सवाल - जवाब न करूं। लेकिन आगे पीछे से ही सवाल - जवाब होने लगते हैं तो बेरुखी से 'मुझे नहीं आता' कहना भी बहुत अजीब सा लगता है। इसलिए जैसे ही प्रश्न पत्र खोलने का आदेश हुआ मैंने सबसे आसान सवाल आगे वाली बहनजी से पूछ लिया - हलो! गोदान तो जयशंकर प्रसाद की रचना है न?
बहन जी ने मुझे उसी नजरों से देखा जिन नजरों से गोदान में मिस मालती ने मिस्टर खन्ना को देखा था। और अफसोस से कहा उन्होंने - अगर बता भी दिया कि गोदान किसकी रचना है तो क्या कर लोगे!
यही सवाल मैंने पीछे वाले भाई से भी किया। अब इस सवाल का चमत्कार यह हुआ कि तीन घंटे में मुझसे किसी ने कुछ भी नहीं पूछा।
पेपर बहुत अच्छा होने की खुशी ने पिछले दिन के तनाव को दूर करने में काफ़ी मदद की। अब हमारी ट्रेन रात के साढ़े दस बजे हजारीबाग रोड रेलवे स्टेशन से थी।मेरा अनुमान था कि रेलवे स्टेशन पास में ही होगा। लेकिन बस स्टेशन पर आकर पता चला कि हजारीबाग से हजारीबाग रोड की दूरी इतनी ज्यादा है कि बस से तीन घंटे लगेंगे। अत्यधिक भीड़ के कारण बस में घुसना एक जटिल प्रक्रिया हो गई थी। दो तीन बसें भर कर निकल जाने के बाद एक बस में टिकट मिली। कंडक्टर ने ऊपर बैठने का आदेश दिया। मैंने बस में झांककर कहा कि इसमें तो ऊपर सीट ही नहीं है। कंडक्टर ने मेरी बुद्धि पर तरस खाते हुए बस की छत दिखाते हुए कहा उधर ऊपर...
हे भगवान! मैंने जिंदगी में बहुत छोटे - मोटे पाप किए हैं। बस और ट्रेन की छत पर बैठकर यात्रा करने जैसा काम कभी नहीं किया।
मैंने कंडक्टर को डांट कर पूछा - और रास्ते में पुलिस ने पकड़ा तो?
मेरे सवाल का जवाब मिलने से पहले ही बीस लड़के बस की छत पर सवार हो गए। मैंने आचार्य जी से कहा - गुरुदेव! जीवन का एक यह भी अनुभव ले लिया जाए। थोड़ी देर बाद ऊपर भी जब बैठने क्या हिलने की भी जगह नहीं रही तो बस ने चलना शुरू किया। रास्ते में पेड़ पौधे पुलिस चौकियाँ आतीं गईं लेकिन किसी ने कोई आपत्ति नहीं की। हाँ! एक बात यह समझ में आई कि जिस बसके ऊपर पच्चीस - पचास लोग बैठे न हों उस बस को अच्छी नज़रों से नहीं देखा जाता।
            रेलवे स्टेशन पर आकर जैसे जान में जान आई। लगा कि अब हमारी समस्याओं का अंत हो गया। अब तो बस ट्रेन में बैठना है और सुबह पाँच बजे बनारस उतर जाना है। लेकिन हमें क्या पता था कि  हजारीबाग को हमसे मुहब्बत हो चुकी थी। स्टेशन के प्रतीक्षालय में जब हमने इंतजार की लगभग आधी सजा काट ली तो अचानक अनाउंस हुआ कि "धनबाद के रास्ते हजारीबाग गया पटना होते हुए वाराणसी को जाने वाली गंगा - सतलुज एक्सप्रेस आठ घंटे की देरी से आएगी, आपकी असुविधा के लिए हमें खेद है"।
दस बजे की ट्रेन सुबह सात बजे आएगी। यह सोच कर ही जैसे धड़कनें ठहर गईं हों इसका मतलब यह कि आज की रात हजारीबाग रेलवे स्टेशन पर काटनी होगी।