Monday, January 30, 2017

पर्दे के पीछे का कालिदास

परभुनाथ चचा परसों एकदम खिसियाए हुए आए थे दुआर पर। देखते ही कहने लगे - तुमको कुछ खबर है भी? हमारे इतिहास और संस्कृति के साथ छेड़छाड़ किया जा रहा है? कुछ लिखोगे इस पर?
मैंने अपनी मजबूरी बताई कि चचा मैं इतिहास का विद्यार्थी कभी नहीं रहा। कुछ संदर्भ, व्याख्या, वृत्तांत गलत हो जाएगा। प्लीज़ माफ कीजिए। मैं बस हिंदी जानता हूँ वो भी थोड़ा-बहुत।
चचा एकदम फायर हो गए - जो रे असितवा! याद है कि नहीं "कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा"
मैंने बात बदलने की गरज से कहा था - ए चचा कल बलिया में 'आषाढ़ का एक दिन' नाटक का मंचन होना है। चलिए न बलिया घुमा लाएँ।
चचा ने बुरा सा मुँह बनाकर कहा - भक्क्! नाटक-रामलीला देखने का जमाना है अब? मोबाइल में "प्रेम रतन धन पायो" डाउनलोड कर रहे हैं उहे देखा जाएगा।
        अच्छा प्रेम रतन धन पायो से एक बात आ गयी। कुछ दिनों पहले बनारस गया था। स्टेशन पर अपने आप चलने वाली सीढ़ियों पर छह सात बार चढ़ने उतरने के बाद मैंने जैसे ही बैग उठाया था वैसे ही एक बहन जी ने पकड़ लिया। पहले तो थोड़ा डरे हम कि कहीं सीढ़ी पर चढ़ने उतरने का पैसा तो नहीं लग रहा था न!
लेकिन बहन जी ने पूछा कि असित कुमार मिश्र हो न? मुझे तो 'बाई गाॅड' तुम्हारा लिखा बहुत पसंद है। घर चलो न! यहीं पास ही में है। मेरी बेटी से मिल लो बहुत अच्छा गाती है। प्लीज चलो न....
दस मिनट बाद उनके घर में थे हम। उनकी आठ साल की बच्ची तो एकदम गुड़िया सी प्यारी और आवाज तो उसकी ऐसी कि बस प्यार हो जाए उससे। उसने जब गीत गाया - सैंया तू कमाल का, बातें भी कमाल की। लागा रंग जो तेरा, हुई मैं कमाल की। पायो रे पायो रे पायो रे प्रेम रतन धन पायो... बस सम्मोहित हुए बिना नहीं रह सका।
मैंने पूछा कि ऐसा ही एक भजन मीरा का भी है न? पायो जी मैंने राम रतन धन पायो। बच्ची ने हँसते हुए बताया कि नहीं अंकल जी ये 'प्रेम रतन धन पायो' मूवी का गाना है। सलमान और सोनम हैं इसमें।
मैं असमंजस में था मैंने बच्ची के पापा से पूछा कि मीरा वाला भजन याद है आपको? उन्होंने हँसते हुए कहा असित बाबू आप हिंदी वाले लोग भी न... अरे अब कहाँ वो भजन-कीर्तन का जमाना है! छोड़िए इन बातों को...
         हाँ! सच में छोड़िए इन बातों को।तो कल मैं पहुँच ही गया बापू भवन बलिया। जहाँ आषाढ़ के निगोड़े बादल बरस रहे थे और मतवाली हवा सर से पाँव तक भीग चुकी मल्लिका को जैसे उड़ा ले जाना चाहती थी लेकिन कालिदास के प्रेम में डूबती हुई आवाज उभरी - "मैंने भावना में एक भाव का वरण किया है"!
आह! मैं कह पाता मल्लिका से तो कहता कि, नहीं मल्लिका भावनाओं से खेलने वाले कवि भावनाओं को समझें भी यह जरूरी नहीं। कवि हृदय अतृप्त होता है और प्रेम चाहता है पूर्णता। तुम दो विपरीत ध्रुवों को मिलाना चाहती हो?
तभी अंबिका का प्रत्युत्तर - तुम जिसे भावना कहती हो वह केवल छलना और आत्मप्रवञ्चना है। भावना से जीवन की आवश्यकताएँ किस तरह पूरी होती हैं?
अद्भुत अभिनय! सच कहा अंबिके। आषाढ़ की वर्षा में इन उपत्यकाओं में दौड़ने वाली यह बावली अब प्रेम मार्ग पर दौड़ना चाहती है। मंदबुद्धि, नहीं जानती कि वन प्रांतरों और गहन उपत्यकाओं से भी पथरीला है प्रेम मार्ग। देखना कालिदास के प्रेम में सर्वस्व न्योछावर करने के बाद भी इसे कुछ प्रतिदान न मिलेगा...।
      सब कुछ जैसे मेरे भीतर ही घटता हुआ सा बीत रहा था।कहीं अनुस्वार और अनुनासिक के हास्य व्यापार पर न चाहते हुए भी हँसी आ गई तो विलोम ने अभिनय का शिखर छू लिया। जब अंत में कालिदास ने कहा कि - विलोम यहाँ से चले जाओ! तो जिस उपहास से विलोम ने पूछा - क्यों चला जाऊँ? इसलिए कि तुम आ गए हो... मन हुआ कि दौड़ कर गले लगा लूँ। आखिर विलोम है तो एक असफल कालिदास ही...।
            जा रहे हैं कालिदास। हताश! निराश! मल्लिका गोद में अपने शिशु को लेकर सिसक रही है। धीरे धीरे पर्दा गिर रह है मेरे आँसुओं के साथ साथ। कालिदास! मैंने पढ़ा है तुमको। आज साहित्य के नियमों से बद्ध नहीं होता तो तुम्हारे समग्र साहित्य पर मैं मल्लिका के उस ग्रंथ को प्रतिष्ठित कर देता जो श्वेत ही रह गया।जिस पर मल्लिका के अनगिनत आँसुओं की बूंदें गिरी हैं जिस पर मल्लिका ने तुम्हारी स्मृतियों में नाखून गड़ाए हैं। भाव विह्वल होकर जिसे दाँतों से काटा है... हाँ कालिदास तुम्हारे कुमारसंभवम् और रघुवंशमहाकाव्यम् पर मल्लिका के कोरे पन्नों वाला एक ही महाकाव्य भारी पड़ गया।हाँ कालिदास मल्लिका के उस महकाव्य को समझने के लिए काव्यशास्त्र और निघण्टु की आवश्यकता नहीं भावना का भाव से वरण करना होगा।जो तुमसे नहीं हो पाएगा... जाओ तुमसे नहीं हो पाएगा यह।
     पर्दा फिर उठ रहा है। क्या फिर आएंगे कालिदास? या विलोम के अभी व्यंग्य बाण शेष हैं? क्या होगा अब?  ओह! अब सभी कतारबद्ध होकर खड़े हैं। निर्देशक आशीष त्रिवेदी पात्र-परिचय करा रहे हैं - ये हैं कालिदास - अमित कुमार पाण्डेय। मल्लिका - स्मृति निधि। अंबिका - ट्विंकल गुप्ता। प्रियंगुमंजरी - सोनी। विलोम - आनंद कुमार चौहान। मातुल - सुनील। निक्षेप - चंदन भारद्वाज। अनुस्वार - अमित अनुनासिक - बसंत। संगीत - ओमप्रकाश और मंच परिकल्पना तथा निर्देशन - आशीष त्रिवेदी।
मैं अपने पात्रों को गौर से देख रहा हूँ। अचानक निर्देशक ने फीकी हँसी हँसते हुए कहा कि - '' यही कालिदास और मल्लिका अंबिका और विलोम जब इस मंचन के लिए लोगों से कुछ आर्थिक सहायता माँगने जाते हैं तो लोग तिरस्कृत और अपमानित करते हैं"।
         आह! तो ये है पर्दे के पीछे का कालिदास! जिसकी विद्वत्ता पर इन्हें कश्मीर की व्यवस्था का भार दिया जा रहा था? ये है मल्लिका की सच्चाई जिसके रूप सौंदर्य पर मैं कुछ क्षणों पूर्व मोहित था। यह है विलोम की सच्चाई जिसके सुस्पष्ट उच्चारण और तर्कों पर मैं इसे हृदय से लगा लेना चाहता था। ये अंबिका हैं जिनकी चरण धूलि माथे पर लगाना चाहता था...। यह मैं किसी दुनिया में हूँ?
       अचानक परभुनाथ चचा का फोन आ गया। मैंने पूछा - हाँ चचा बताइए।
चचा बोले - देखो बबुआ एगो फिल्म में कुछ बवाल की बात सुनाई दे रही है। थोड़ा फेसबुक पर आओ तो।
मैंने फेसबुक खोला पहली ही पोस्ट दिखी बनारस वाले भाई साहब की जिनकी लड़की गा रही थी प्रेम रतन धन पायो। 'वो तन चितउर मन राजा' बने पद्मावत के चौपाई पर चौपाई पोस्ट कर रहे थे। मैंने परभुनाथ चचा की पोस्ट देखी उन्होंने लिखा है कि अब एक "संस्कृति रक्षा व्हाटस ऐप ग्रुप" की सख्त जरूरत है।
मुझे हँसी आ गई। चचा ने खिसिया कर पूछा - 'मो पर हँसहू कि हँसो कुम्हारा'।
           मैं कैसे कहूँ कि किस पर हँसी आई। परसों चचा ने जो कहा था' कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी' इसमें "कुछ बात" क्या है? निश्चित ही हमारी संस्कृति हमारी भारतीयता। न जाने कितने लोग आए और हमारी संस्कृति में रच बस गए। हमारी परंपरा जो फिजी,मारीशस,सूरीनाम,त्रिनिदाद ही नहीं, अमेरिका में भी जाती है तो एक हिंदुस्तान बना देती है। तीन दिन किसी अंग्रेज़ के साथ एक बलिया वाले को रख दीजिए। बलिया वाले को अंग्रेजी आएगी कि नहीं इसकी गारंटी नहीं है लेकिन वो अंग्रेज़ जरूर सीख जाएगा कि - ए मरदे टेक युअर सीट।
ऐसी मीठी संस्कृति में जहर बोने वाले लोग हर क्षेत्र में हैं। फिल्म और मीडिया में तो अत्यधिक। जो लोग फिल्म को समाज का आइना कहते हैं वो भूल रहे हैं कि अब समाज फिल्मों का आइना बन गया है। चलिए आपसे पूछता हूँ कि 'प्रेम रतन धन पायो' कहते ही मीरा की स्मृति आई थी कि सोनम कपूर जी की? क्या हुआ मीरा गौण हो गईं और सोनम प्रधान। आश्चर्य कि हमें पता तक नहीं चला। कुछ दिनों पहले एक फिल्म आई थी गोलियों की रासलीला। आज भी समाचार पत्रों में खबर बनती है - खेत में 'रासलीला' करते दो धराए।
चलिए आपसे पूछता हूँ कि 'रासलीला' कहते ही मन में क्या आया? देखा आपने रासलीला जैसे शुद्ध आध्यात्मिक शब्द को जिसके बारे में श्री शुकदेवजी कहते हैं कि यह चिंतन प्रधान है अनुकरण प्रधान नहीं। इसे दैहिक वासना की पूर्ति से जोड़ दिया गया और हमें आभास तक नहीं हुआ।
चलिए आपसे पूछता हूँ कि पहले मैंने आपने(समाज ने) गजनी कट-तेरे नाम कट बाल रखे या आमिर-सलमान ने? पहले ये अजीब-अजीब ढंग के कटे फटे जींस मैंने पहने या किसी हीरो हीरोइन ने? जाहिर है आज के समाज को फिल्म ही बना रहा है। तब क्या उन पर नियंत्रण नहीं होना चाहिए? नियंत्रण छोड़िए आत्मबोध नहीं होना चाहिए! आखिर "लौंडिया पटाएंगें हम फेवीकोल से " में कौन सा दर्शन है मुझे जानना है। स्त्री की कौन सी छवि को दिखाने की कोशिश है यह?
आज हर कालेजिएट लड़की, लड़की नहीं आइटम और लौंडिया हो गई है। किसने बनाया - फिल्मी हीरो ने। जब वो कालेज के बाहर मोटर साइकिल पर उल्टा बैठे चार अजीब शक्ल वाले दोस्तों के साथ यही डायलॉग सुनाता है तो हमारी युवा पीढ़ी अनुकरण करती है।
बड़ी तेजी से हमारी संस्कृति और तहजीब को दूषित किया जा रहा है। दोष किसका है? मेरा आपका हमारा। वो कैसे? उनका काम है अंधकार फैलाना। तो हमको किसने रोक रखा है उजाला करने से। जिस तरह छोटी छोटी बातों से हमारी संस्कृति दूषित हो रही है उसी तरह छोटी छोटी बातों से ठीक भी हो सकती है। कुछ दिनों पहले मैं आजमगढ़ गया था श्रीमती अनीता सिंह जी से मिलना हुआ। मैंने उन्हें अपने कस्बे का बना हुआ गुलाब जल दिया था। उन्होंने पूछा था कि असित इसकी क्या जरूरत थी क्यों लाए इसे?
आज बता ही देता हूँ अब जब भी वो भी किसी सांप्रदायिक घटना पर पूरे मुसलमानों को कोसेंगी तो उन्हें याद आएगा कि असित ने जो गुलाब जल दिया था उसमें सिकन्दरपुर के मुसलमानों की खुश्बू है जो हमें मुहब्बत और अदब सिखाती है। अब आपसे पूछता हूँ कितने ऐसे लोग होंगे जो अपने जनपद की विशेष चीजें किताबें दूसरे जनपदों के लोगों को देते होंगे। कब समझेंगे हम कि यह वस्तु विनियम नहीं संस्कृति का आदान प्रदान है। हमारी संस्कृति ऐसे ही बढ़ी है और ऐसे ही बढ़ेगी।सैकड़ों हजारों तरीके हैं ऐसे ही जिनसे हमारी परंपरा समृद्ध हो सकती है।
        पता है आपको हमारी संस्कृति के सच्चे वाहक कौन होते हैं? रंगकर्मी। और वो किस हाल में हैं सोचा है कभी आपने? जिस 'आषाढ़ का एक दिन' नाटक का मंचन हुआ उसके निर्देशक की पीड़ा समझी आपने? आपकी गौरव गाथा के ध्वजवाहक कालिदास, आपकी मल्लिका किस हाल में हैं सोचा है कभी? नहीं न! तो संस्कृति और साहित्य पर व्याख्यान देने का अधिकार नहीं है आपको। आपके जनपद के साहित्यकार कौन है? रंगकर्मी कौन है? आपको पता ही नहीं। नाटकों रामलीलाओं के मंचन में आपकी रुचि ही नहीं और संस्कृति बचाने के लिए व्हाटस ऐप ग्रुप बना लिया! पर्दे के पीछे के कालिदास को गौर से देखिए उसके साथ खड़े होइए। मेरा दावा है कि हजारों दूषित मानसिकता वाली फिल्में और गाने भी हमारी संस्कृति को नष्ट नहीं कर सकते।
असित कुमार मिश्र
बलिया
         
          

       

Monday, January 23, 2017

जनता क्या है? ....

टूटे हुए दिल का राजनीति शास्त्र ....

दौर चाहे मीर का रहा हो या गालिब का, फिराक का रहा हो या नवाज़ साहब का। गवाह हैं आशिक-ओ-माशूक के वो नखरे, वो अदाएँ , कि दिल पर कुछ भी लिखने का काॅपीराइट इन शायरी लिखने वालों के पास ही रहा है। और इन शायरीबाज़ लोगों ने दिल के साथ बहुत नाइन्साफ़ी की। जिस दिल से सैकड़ों-हज़ारों तरह के और भी काम लिए जा सकते थे, उस दिल से, इन लोगों ने बस मेहबूब की याद में तड़पने का काम लिया। कुछ फारसीदां लोगों ने तो दिल से आहें भी भरवाईं। हालाँकि दिल ने बेरुखी से कहा भी कि - मियाँ! कुछ 'काॅमन सेंस' भी लगा लिया करो ये आहें भरने का काम फेफड़े का होता है, दिल का नहीं। अब कल को हमीं से हाज़त रफ़ा भी न कराने लगना...।
              गुजरते वक्त के साथ आशिकों के तौर-तरीके बदल गए। इधर मुहब्बत ने भी अपने उसूल और मेयआर बदल लिए। अब मुहब्बत की पैमाइश साथ जीने मरने के वादों-इरादों और खून भरे खतूत से नहीं, रिचार्ज कराए गए बैलेंस से होने लगी है। नाज़नीनों की उंगलियाँ गुलाबी कागज़ पर अब मिलन की दुश्वारियाँ, जमाने के सितम और रिवाज़ों की बंदिशें बयां नहीं करतीं बल्कि व्हाट्सऐप पर वाॅइस मेल भेज देतीं हैं।सब कुछ आसान सा हो गया है। इसीलिए अब मुहब्बत में टूटने से दिल ने भी साफ मना कर दिया है। बहुत हुआ तो आशिक ने दो - चार बार म्यूजिक प्लेयर पर वो गाना सुन कर अपना गम गलत कर लिया कि - मुहब्बत अब तिज़ारत (व्यवसाय) बन गई है...।
        लेकिन तिज़ारत भी अब आसां कहाँ रह गई! इधर जबसे जमाना 'कैशलेस' का हुआ है, हर 'लेन-देन' की रसीद माँगी जानी लगी है। कल तक जो लेना-देना बस निगाहों के दो-चार इशारे से मुकम्मल मान लिया जाता था, अब वहाँ भी किसी लैला को मजनू से कहना पड़ रहा है - 'लिख के दो कि अपना दिल मुझे दे रहे हो'।
मुहब्बत के इन नये तौर-तरीकों से नावाकिफ़ मजनू चिढ़ कर कहता है - लिख कर ही क्या, कहो तो 'नाॅमिनी' भी तय कर लें।
अब बड़े नाज़-ओ-अदा से जींस की जेब में हाथ डालते हुए लैला कहती हैं - बड़े नादान हो जी... इतना भी नहीं जानते कि मुहब्बत में कोई नाॅमिनी नहीं होता....।
          अब कस्में वादे तहजीब रवायतें इरादे ही नहीं दिल भी सियासी हो गए हैं। इधर दिल की फितरत ही है टूटना। वो कहा भी है न कि -'शीशा हो या दिल हो आखिर टूट जाता है'। लेकिन मुसीबत यह कि कम्बख्त दिल टूटे तो टूटे कहाँ!  मुहब्बत में टूटने से तो रहा। इसलिए अब दिल सियासत में टूटते हैं। कल रात तक जो बलियाटिक वज़ीर समाजवाद से शदीद मुहब्बत करते थे वही टिकट कट जाने पर 'समाजवादी पार्टी बेवफा है' कह रहे हैं। जो दिल ना कभी मुहब्बत में टूटा था, ना कभी तिज़ारत में। उस मजबूत दिल को इस नामुराद सियासत ने तोड़ दिया। कितनी हसरत थी उन्हें जनता की सेवा करने की। बलिया को स्वर्ग बना देने के लिए कमर कस कर एकदम तैयार थे। तब तक वज़ीरेआला ने टिकट ही काट दिया। उफ़! शीशे का प्लास्टिक का क्या, ग्रेफाइट का भी दिल होता तो कम्बख्त टूट ही जाता।
ऐसे तमाम वज़ीर और उनके साथ सैकड़ों हजारों प्यादे, टूटा हुआ दिल लेकर कभी इस सियासी पार्टी से मुहब्बत कर रहे हैं तो कभी उस सियासी पार्टी से।
जो कल तक दलितों और मुसलमानों के मसीहा बने तकरीरें करते थे, जैसे ही सियासी पार्टी ने टिकट काटा वैसे ही वो किसी भी तरह कुर्सी पाने के लिए गौ और गंगा की आवाज़ बने घूमने लगे। जो दो साल पहले से कमल के फूल पर भँवरा बने मंडरा रहे थे वो टिकट न मिलने पर अपना अलग गुल खिलाने में लग गए। जो नित्य प्रातः स्मरण मंत्र की तरह 'पार्टी के प्रति निष्ठा' का जाप करते थे, वो टिकट न मिलने पर 'निर्दल' ही जनता की सेवा करने के लिए 'व्याकुल भारत' बने हुए हैं। एक सियासतदां बसपा से विधायक रहे पिछली बार। इस बार भाजपा के टिकट की दौड़ में सबसे आगे हैं। क्योंकि बसपा से दिल टूट गया है न!
कल तक मोदी जी को चोर कहते रहे और मायावती जी मुस्कुराती रहीं। अब से मायावती जी को कहने लगेंगे और मोदी जी मुस्कुराएंगे। परसों जैसे ही भाजपा से दिल टूटा कि फिर मायावती जी से मिल कर मुलायम जी को चोर कहेंगे।उधर मोदी जी और मायावती जी दोनों मिलकर मुस्कुराएंगे....
आप सोचते हैं कि क्या है यह? 
जनाब! यही तो 'टूटे हुए दिल का राजनीति शास्त्र' है।
आप पूछेंगे - और जनता?
मैं क्या कहूँ! 'धूमिल' ने तो कहा ही है -

जनता क्या है?
एक भेड़ है
जो दूसरों की ठंड के लिए
अपनी पीठ पर
ऊन की फसल ढो रही है....

असित कुमार मिश्र
बलिया
        

Sunday, January 22, 2017

थोड़ी सी कमी रह जाती है

कुछ दिनों से इलाहाबाद में हूँ। इलाहाबाद के बारे में कुछ भी लिखना जैसे जलते हुए तवे पर उंगलियों से अपनी ही कहानी लिखना है। दो हज़ार से लेकर चार हज़ार रुपये तक के सिंगल से कमरे में सैकड़ों ख्वाब, हज़ारों किताबें और अनगिनत तमाम हो चुके रजिस्टरों के जोड़-तोड़ में कैसे जिंदगी बीतती है, ये यहाँ रहने वाला ही बता सकता है। यहाँ जब घर से भेजे गए पैसे पर इलाहाबाद भारी पड़ने लगता है तो किसी पार्टनर की तलाश की जाती है। अगर एक वाक्य में इलाहाबाद के बारे में कहना हो तो, हम कह सकते हैं कि जिंदगी जहाँ पार्टनरशिप में गुजरती है उस जगह का नाम है इलाहाबाद। हजारों बर्बाद हो चुकी ख्वाहिशात के बीच भी जो एक छोटी सी उम्मीद बची रहती है कि चलो 'यूपीपीएससी ना सही एसएससी ही सही' इसी को इलाहाबाद कहते हैं। और इस सूत्र वचन को समझाने वाला जीव ही पार्टनर होता है। मतलब हर चीज यहाँ पार्टनरशिप पर ही टिकी हुई है। दो साथ में रहने वाले लड़के बस रुम पार्टनर या बेड पार्टनर ही नहीं होते बल्कि वो सब्जी के थैले से लेकर छोटके खाली सिलेंडर को भी दोनों ओर से पार्टनरशिप में पकड़े हुए ही चलते हैं। भले ही सामने से आ रही कोई आंटी जी बीच में पड़ कर टकरा जाएँ लेकिन सिलेंडर वाली यह पार्टनरशिप टूटती नहीं।
समय के साथ-साथ इस पार्टनरशिप की गहराई, लड़कों की लंबाई और घर वालों के उम्मीदों का आयतन बढ़ता जाता है। एक समय ऐसा भी आता है जब रोते हुए छपरा के मुकेश को आजमगढ़ का सोनू चुप कराते हुए कहता है कि - भाई चुप हो जाओ, देख लेना 'वो' कभी खुश नहीं रहेगी...।
हालांकि है तो यह बद्दुआ ही। लेकिन जो सूकून मुकेश को इस बात का असर होते हुए सोचकर मिलता है, वह सूकून तो कभी प्रतिभवा भी उसे न दे सकी थी। उधर सोनू का कलेजा भी कुछ दिनों तक शंकर पान भंडार वाले के यहाँ बजते हुए गाने - 'इक ऐसी लड़की थी जिसे मैं प्यार करता था' को सुन कर आहें भरने लगता है जैसे प्रतिभवा से मुहब्बत में भी उसकी पार्टनरशिप रही हो।
          लेकिन कुछ पार्टनरशिप की उम्र यूपीपीएससी की तैयारी कर रहे लड़कों की जवानी जैसी होती है। कम्बख्त कब ख़त्म हो जाए पता ही नहीं चलता। साथ- साथ खाने वाले, साथ-साथ सोने वाले, दो पार्टनर में से एक कब अल्लापुर से निकल कर छोटा बघाड़ा में किसी और का पार्टनर बन जाता है, यह भी पता नहीं चलता। फिर किसी दिन अचानक अल्लापुर के राजू बुक डिपो पर कोई समसामयिकी खरीदने में दोनों टकराते हैं। साथ बिताई हुई रातों की करवटें और साथ-साथ ढोए गए खाली सिलेंडर की बची हुई थोड़ी सी गैस, एक छोटी सी मुस्कान में तब्दील हो कर होठों पर फैल जाती है। जिसका मतलब होता है कि - का हो ससुर मजा आवत हौ न अब अकेले बर्तन मांजते हुए...।
दूसरी तरफ का लड़का भी उसी अदा से एक रहस्यमयी मुस्कान उछालता है जिसका मतलब है कि - हाँ ससुर तुम्हारे इहाँ से अच्छे हाल में ही हूँ।
इस तरह दो बिछुड़े हुए पार्टनर जिंदगी के किसी मोड़ पर दुबारा मिल कर 'नैनन ही सों बात' कर लेते हैं।
           इलाहाबाद की संस्कृति में अकेले इलाहाबाद नहीं, इसमें बलिया बनारस छपरा आजमगढ़ समेत अनेक जिलों और प्रांतों की बोलियाँ, रूप और ख्वाब ठीक वैसे ही मिले रहते हैं जैसे चावल में कंकड़। जो लाख बीन कर निकालने के बाद भी किसी न किसी दाँत के नीचे आकर बता ही देता है कि- बेटा इलाहाबादी चावल और यूपीपीएससी को थोड़ा ध्यान से... बूझे कि नहीं!
इलाहाबाद में लडकों की आर्थिक स्थिति के बारे में पूछा नहीं जाता। बस उनकी रहने वाली जगहों से अपने आप पता चल जाता है और सीनियर्स इसी आधार पर जूनियर को सलाह भी देते हैं। जैसे एक जगह एक लड़के से सवाल हुआ - कहाँ रहते हो?
जवाब मिलता है अल्लापुर में।
तुरंत धमकी मिलती है - मेहनत करो बेटा ये जो कप में चाय लिए स्टाइल मार रहे हो न, इसकी कीमत घरवाले जानते होंगे तुम नहीं।
दूसरी जगह दूसरे लड़के से वही सवाल - कहाँ रहते हो?
जवाब मिलता है- सलोरी में।
धमकी की जगह तुरंत सलाह आ जाती है - चाय के साथ-साथ पढ़ना भी जरूरी है दोस्त।
तीसरी जगह तीसरे लड़के से वही सवाल - कहाँ रहते हो?
जवाब मिलता है - कटरा में।
सलाह तुरंत फीकी हँसी में बदल जाती है और कहा जाता है कि भाई आप अरबपति लोग न भी पढ़ो तो क्या फर्क पड़ता है। है कि नहीं...।
          इस तरह बिना बताए ही पता चल जाता है कि कौन गरीबी रेखा से नीचे वाला है और कौन मध्यमवर्गीय तथा कौन अमीर परिवार का।
         सांस्कृतिक रूप से इलाहाबाद का सबसे पवित्र महीना है माघ। लेकिन यूपी-बिहार की संस्कृति से लड़कर यूपीपीएससी से दो-दो हाथ करने आए लड़कों के लिए सबसे दुर्दिन का महीना यही है। इसी महीने में गाँव के किसी चाचा या काका का अनचाहा फोन आता है - हैलो.... हैलो!! दीनानाथ बाबू बोल रहे हो न?
दीनानाथ ने इलाहाबाद उतरते ही जो पहला काम किया था वो यही कि इस गँवई और ओल्ड माॅडल नाम दीनानाथ से 'डिनो' हो गए थे। लेकिन ये गाँव-घर वाले आज भी दीनानाथ ही कहते थे।
इतनी ही देर में पाँच बार 'हैलो-हैलो' हो गया। खीझ कर कहते हैं दीनानाथ - हाँ कहिए कौन सर बोल रहे हैं आप?
उधर से खुशी भरी आवाज़ आती है - एकदम अफसर जैसा बोलने लगे हो बबुआ। अरे हम रामाशंकर शुकुल बोल रहे हैं। पहचाने कि नहीं! अरे आचार्य जी हैं न हम। ना चाहते हुए भी दीनानाथ के मुँह से निकलता है - चाचा जी परनाम।
अब आचार्य जी व्यग्रता से पूछते हैं - इलाहाबाद में कहाँ रहते हो बबुआ?
दीनानाथ का मन हुआ कि कह दें हम एमपीपीएससी देने आए हैं लेकिन कसमसा कर कहते हैं - प्रयाग में रहता हूँ।
अब भक्ति-भावना में नासिका तक डूबकर आचार्य जी गदगद स्वर में कहते हैं - आ हा हा हा! जानते हो बबुआ, प्रयाग का नाम प्रयाग क्यों पड़ा था?
लीजिए! यह सवाल तो यूपीपीएससी के सेलेबस में है ही नहीं....
लेकिन आचार्य जी खुद ही बोल पड़ते हैं, अत्र ब्रह्मण प्रकृष्टयागकरणात् अस्य नाम प्रयाग: अभवत्।
दीनानाथ कहते हैं - चाचा जी साफ साफ कहिए बात क्या है?
आचार्य जी कहते हैं - बबुआ अबकी माघ में स्नान करने के लिए आ रहे हैं हम। तुम्हारी चाची भी हैं साथ में। बस सुबह स्नान करा देना। जानते हो बबुआ गंगा यमुनयो: संगमे सितासितजले स्नात्वा जना: विगतकल्मषा भवन्ति.... ।
दीनानाथ बाबू कपार पीट लेते हैं। इनका बस चलता तो संगम को ले जाकर बिहार बार्डर पर कर आते और कहते कि लीजिए चचा 'विगतकल्मषा' होते रहिए।
        रुम कहे जाने वाले बारह बाई चौदह साइज़ के कैदखाने की आठ वाॅट के सीएफएल की दूधिया रोशनी से निकलकर इस कोचिंग से उस कोचिंग तक ही दिन कब बीत जाता है, कुछ पता ही नहीं चलता। हाँ! रात होने से पहले शाम को एक बार मोबाइल के एफ एम पर एक प्यारी सी नज़्म उभरती है, निदा फाज़ली की। जिसे सुनकर अल्लापुर के किसी रुम में बैठे मुकेश-सोनू या प्रयाग में चाचा चाची के लिए सब्जी काट रहे दीनानाथ शुकुल हों या फिर किसी गर्ल्स हाॅस्टल के कमरे में अधलेटी प्रतिभवा ही नहीं आधा इलाहाबाद उदास हो उठता है -
हर कविता मुकम्मल होती है
लेकिन वो कलम से, कागज़ पर जब आती है
थोड़ी सी कमी रह जाती है।
हर प्रीत मुकम्मल होती है
लेकिन वो गगन से, धरती पर जब आती है
थोड़ी सी कमी रह जाती है।
हर जीत मुकम्मल होती है
सरहद से वो लेकिन, आँगन में जब आती है
थोड़ी सी कमी रह जाती है।
फिर कविता नई
फिर प्रीत नई
फिर जीत नई.... बहलाती है
हर बार मगर लगता है यूं ही
थोड़ी सी कमी रह जाती है....

असित कुमार मिश्र
बलिया